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Sunday, 17 July 2011

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मला कळाली पुन्हा नव्याने, नव्या पिकांची नवीन भाषा
कठीण मातीत रूजणार्‍या, नव्या बियांची नवीन भाषा

नशीब आहे विचित्र मोठे, कुणास रुजण्यास खडक-धोंडे
कठोर पाषाण भेदणार्‍या, नव्या मुळांची नवीन भाषा

                                                 गंगाधर मुटे
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(नव्या यमांची नवीन भाषा    या गझलेतील शेर)

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